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Motivational Story Hindi Article | Ander Ke Paniyon Mein Ek Sapna Kampta Hai

addthis
     
Author:

jayaa jaadvaanaI

Category: HomearrowStories
Summary:

A Hindi story by Jaya Jadvani that vividly depicts the Indian social ethos and a woman's experience towards motherhood - Ander Ke Paniyon Mein Ek Sapna Kampta Hai.

Article:
This story about motivation by Jaya Jadvani. She write this story for indian social ethos and a woman's experience towards motherhood. With this story you will get a motivational message .

सब आहिस्ता-आहिस्ता जा रहे हैं। सब जानते हैं, समय निकट है, कभी भी हो सकता है, पर कोई रुक नहीं रहा। बीस दिन का इंतजार और वे सोचते हैं, पता नहीं कब हो? बारह महीने पूरे करेगी क्या? कोई-कोई व्यंग्य से कहता है और सब हँसने लगते हैं। इतनी बडी फ़ैमिली, कम-अज-कम साठ लोग होंगे। हालांकि है तो सबके घर और चूल्हे अलग पर मानसिकता वही साथ रहने की। किसके घर क्या हो रहा है? क्या पका है? कौन बीमार है? कौन बहू सुबह कितने बजे उठी? किसकी सब्जी अच्छी नहीं बनी और सास से तकरार हो गई? कौन दुपट्टा सिर पर लिये बिना ससुर के सामने से गुजर गई और उस बेचारे को अपनी आँखे परे करनी पडी - सबको सब पता है। यँहा तक कि सुबह जल्दी अगर किसी के बाल धुले हों तो समझ लिया जाता कि, रात क्या हुआ था। तब वे इशारों से हँसती-हँसाती। पूछती - रात तुम दौडते हुए घोडे पर चढी थीं? वह शर्माती और हँसी के फव्वारे फूटते। मुझसे जब पहली बार पूछा गया तो मैं ने बडा बेवकूफाना सवाल पूछ दिया, कौनसा घोडा? वे इतना हँसीं कि जमीन पर लोट-लोट गईं। तब से मुझे डर लगने लगा था। जिन दिनों विकी यँहा होते, जी करता, रात ही में बाल धोकर सुखा लूं कि कल हँसी का पात्र न बनूं , पर फिर लगता कि बाल न धोने पर किसी की उत्सुकता और जासूसी का पात्र न बन जाऊं। कहीं चैन नहीं, कुछ करने, और न करने दोनों का जवाब आप ही को देना है।

पहले-पहल मैं इन्हें पहचानने से खूब चूकती- ससुर के सात भाई, सात सासें, उनकी बहुएं, फिर बच्चे, खुद मेरे तीन देवर, दो ननदें, एक बडी, एक छोटी, फिर लम्बी-चौडी बिरादरीजो आता, सबसे पहले पैर छुओ। फिर सात सासें - दिन भर का ब्यौरा लेने अकसर वे एक के बाद एक पहुंचती

'' आज क्या पल्ली(चने की भाजी) और तवे की सब्जी बनी है?
ये सूट तुम्हारे मायके से आया है या विकी ने लेकर दिया है?
आज हमने कढी चावल बनाए हैं।
क्या करें , आजकल सब्जियां अच्छी नहीं लगती।
अच्छा सिर्फ तुम्हें सिलाई आती है या कढाई भी?

ऐसे प्रश्नों का जवाब अकसर मम्मी दिया करती। वैसे उनको उत्तर की फिक्र नहीं होती थी, आप दें न दें। वे बदस्तूर चालू रहती। कभी दो-दो, तीन-तीन सासें एक साथ बैठकर बातें करतीं और सब एक साथ बोलतीं। दूसरे के जवाब से उन्हें कोई मतलब नहीं। ज्यादातर बातें, आजकल की बहुएं । जब तक अच्छी तरह कैथार्सिस न हो जाता, वे चुप न होतीं। और वो होता भी कमजैसे ही गङ्ढा खाली होता कि फिर भर जाता।

कोई-कोई अपने घर से सब्जी ले आती और बदल कर ले जाती। किसी को अगर कोई सब्जी पसंद नहीं आती तो नो प्रॉब्लम किसी के यँहा जाकर बदल आओ। हमारे खाने में कम-अज-कम छ: सात सब्जियां होतीं ही होतीं।

मैं छोटी फैमिली से आई थी। माँ बाबूजी से अकसर कहा करती- अपनी बेटी की शादी बडी फ़ैमिली में करना। मुझे देखो मैं दिन भर अकेली रहती हूँ। बडी फ़ैमिली में रहने का मजा ही कुछ और होता है, कोई भी अकेला नहीं रहता।

और वही हुआ भी । मैं कभी अकेली नहीं रह पाती। जब विकी बाहर रहते, तब भी नहीं। अकेली होने के लिये मुझे आधी रात का इंतजार करना पडता जब मैं अपने कमरे मैं होऊँ, वो भी तब, जब मैंने अपने साथ अपनी छोटी ननद को सुलाने से इनकार कर दिया जो अपने भाई की गैरमौजूदगी में भाभी के साथ सोना चाहती। उसकी मौजूदगी में अगर मैं रात को दो बजे तक पढती तो सुबह सारी कॉलोनी को मालूम हो जाता। इतना ही नहीं वह अपने भाई के भेजे प्रेम पत्र न सिर्फ चुरा कर पढती, बल्कि कुछ गायब भी कर देती। मुझे डर लगता, ये पत्र कल फिर इन्हीं गलियों में बाँचे जाएंगे। यँहा कोई भी चीज अपनी नहीं, सब सबका है - कपडे, ग़हने, साबुन, टॉवेल तक। मुझे तो कई बार विकी भी बंटा-बंटा लगता। एक टुकडा कहीं, एक टुकडा कहींवह किसी को ना नहीं करता और सबकी इच्छाओं के बीच उसकी अपनी इच्छा महत्वहीन हो जाती। सुबह छ: बजे से रात ग्यारह बजे तक घर में कोई न कोई आता-जाता ही रहता, न अपनी हँसी, न अपना रोना, न अपना खाना। लाख कोशिश कि सब में घुल-मिल जाँऊ, आखिर यहीं रहना है सारी उमर, पर नहीं हुआ तो नहीं हुआ।

इसी सब के चलते शादी के तीसरे साल जब मैं जब सबको पहली बार पता चला, सारे मोहल्ले में खुशी की लहर दौड ग़ई। बधाइयों का तांता दिन भर चलता सिर्फ मैं अनिश्चित थी। मुझे कुछ और चाहिये था, पर क्या, मैं नहीं जानती थी। भावी पोते के लिये मम्मी सामान इकठ्ठा करने लगीं। मायके से मेरी माँ भाई से खत लिखवा कर भेजतीं - दौड क़र सीढीयाँ मत चढना, भारी चीजें मत उठाना। ज्यादा गुस्सा मत करना आदि-आदि। पर मुझे कुछ नहीं छू रहा। तीन साल से मैं अकेली जी रही हूँ। नहीं, तीन साल से नहीं, जब से मैं पैदा हुइ - बाईस साल से। विकी का साथ रात के सपने की तरह होता कि जब तक सुबह उठ कर आप उस ख्वाब को पहचानें-पहचानें - घर का रूटीन हाथ पकड क़र अपनी तरफ खींच लेता।

और दिन गुजरते-गुजरते आखिर नौ महीने पूरे हो गए। कुछ दिन और ज्यादा ही कि मम्मी को एक शहर में मैरिज अटेन्ड करने दूसरे शहर जाना था। वे मना कर सकती थीं, पर उन्हें इतने सारे लोगों के होने का यकीन था कि सिर्फ उनकी गैरमौजूदगी से क्या फर्क पडेग़ा। बकौल उनके, एक बार हॉस्पीटल जाने के बाद सारा काम तो नर्सेज क़रती हैं, तो वे रुक कर क्या करेंगी? और वे चली गईं। अलबत्ता मेरी माँ ने छोटे भाई को भेज दिया था कि मेरी डिलीवरी तक वहीं रहे। क्या जाने कब किस चीज क़ी जरूरत पड ज़ाए।

विकी आए तो दस दिन रुके, इंतजार करते रहे। घर में सासें हिसाब लगाती - दसवां महीना खत्म होने जा रहा है। क्या होगा? फिर भगवान के भरोसे छोड देतीं - जो होगा अच्छा ही होगा। डॉक्टर के पास जाओ तो कहेगा, ऑपरेशन।

वे सब विकी से कहतीं - कितने दिन रुकेगा तू अपना काम-धाम छोड क़र? पता नहीं कितनी देर है? फिर ये तो औरतों के काम हैं, तू क्या करेगा? वैसे भी तेरी बीवी बडी बहादुर है। और वे चले गए। मैं जानती थी, वे अपने पापा से ही नहीं, अपने बडे चाचाओं से भी डरते हैं। और मैं उन्हें कभी धर्म संकट में नहीं डालती।

विकी को गए दो दिन हो गए और एक रात ग्यारह बजे हल्का-हल्का दर्द महसूस होने लगा। सुना है इतना दर्द होता है कि जान निकल जाती है। अभी जान नहीं निकल रही, अभी देर है। रात का खाना हो चुका था। सब अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। मैं अपने कमरे में हॉस्पीटल जाने की तैयारी करने लगी धीरे-धीरे। एक बास्केट में छोटे बच्चे के कपडे, दो सफेद चादरें और कुछ जरूरी ताम-झाम जो दिन भर सुनती रहती हूँ कि वहाँ जरूरत पडती है। यह भी सुना था कि लगातार चलते रहो तो तकलीफ कम होती है सो अपना कमरा साफ कर डाला - किचन साफ कर डाला। अब दर्द की लहरें उठने लगीं एक खास अन्तराल में - उन क्षणों ठहर जाती दीवार पकड क़र, दर्द गुजर जाता तो फिर काम में जुट जाती। फिर हॉस्पीटल में कहाँ नहाना, धोना होगा, सो जाकर खूब देर नहा भी आई। तीन बज चुके तो जाकर बडी ननद को उठाया, जिनके आसरे मम्मी मुझे छोड ग़ईं थीं। वे उठकर आईं और मेरा चेहरा देख कर कहा -

'' अभी देर है, इतनी जल्दी हॉस्पीटल चलकर क्या करेंगे? चाय बनाकर पी और घूमती रह। वे फिर सो गयीं।

मैं ने दो घण्टे और गुजारे। दर्द इतना बढ ग़या था कि दर्द की लहर उठती, मैं खडी न रह पाती, मेरे घुटने मुड ज़ाते और मैं नीचे झुकने लगती, सामने पेट नहीं झुकने देता, पीछे पीठ पाँच बजे उन्हें फिर उठाया -

'' तैयारी कर ली है? उन्होंने पूछा और बाथरूम में घुस गईं।

छ: बजे हम रिक्शे में बैठ हॉस्पीटल की ओर रवाना हुए। दर्द की लहर उठती और मैं रिक्शे में होंठ भींच कर सर नीचे कर लेती। वे बता रही थीं - एक बार एक स्त्री को रिक्शे में ही बच्चा हो गया। रिक्शेवाले ने हॉस्पीटल के सामने जाकर रिक्शा रोका और दौडता हुआ अंदर जाकर सिस्टर्स को बुला लाया। उस स्त्री के साथ वाली उसका बच्चा पकड क़र बैठी थी। नर्सेज स्ट्रेचर लेकर आयी और उस स्त्री के घर वालों को खूब गालियाँ दीं। रिक्शे में ही उस बच्चे का नाल काटा और दोनों को अन्दर ले गए।

एक बार उनकी किसी रिश्तेदार को कार में डिलीवरी हो गई। पूरी कार खून से लथपथ। उसने सीट पर बैठे बैठे बच्चे को लपक लिया और लगी जोर-जोर से चिल्लाने। सुनकर मुझे डर लग रहा है। मेरा छोटा भाई पीछे-पीछे स्कूटर पर आ रहा है, उसका चेहरा उतरा हुआ है। विकी के जाते समय उसने बडी अाजिजी से कहा था, जीजाजी आप मत जाईए। विकी ने उसके कन्धे पर हाथ रख कर मुस्कुराते हुए कहा था - अरे यार, तू है न, फिर मैं कितने दिन रह सकता हूँ? तू फोन कर देना, जब भी तकलीफ हो, मैं उसी पल भागा चला आउंगा।

फोन? अभी तक तो किसी ने नहीं किया। भाई ने सुबह कहा तो बडी ननद ने तपाक से कहा -

'' वो क्या करेगा आकर? और अब कुछ ही घण्टों की तो देर है, इधर बेटा हुआ, उधर फोन कर देंगे। फिर तो सबको ही फोन करना होगा।

फोन मेरे बडे ससुर के यँहा है सिर्फ , जिसे करना हो वहीं जाना होता सो मेरा भाई नहीं गया।

हॉस्पीटल पहूँचे तो मेरा चेहरा देख कर ही एक नर्स मुझे पकड क़र अंदर ले गई और भाई आवश्यक कागजी क़ार्यवाही करने लगा।

एक बडा सा हॉल जहाँ तीनों दीवारों से सटे बिस्तर लगे थे और सभी पर अधनंगी औरतें चीख-चिल्ला रही थीं, मैं डर गई। मैं ने ऐसा दृश्य आज तक नहीं देखा था। उनके जिस्म पर सिर्फ एक ही कपडा था गाऊन या पेटीकोट नुमा उनके फूले पेट पर अस्तव्यस्त पडा था उनका धड बेहिस व्याकुलता में बिस्तर पर पैर पटकता किधर देखूं ? जिधर नजर जाती यही नजारा - हाय रब्बा! यह भी दिन देखना था।

'' इसको कपडे बदलवा दो । एक नर्स ने ननद को आदेश दिया। उन्होंने बास्केट में से एक गाऊन निकाल कर मुझे दिया और बाथरूम की ओर इशारा किया

''अण्डर गारमेन्ट्स भी उतार देना। उन्होंने सिन्धी में कहा।

मेरी हालत काफी खराब थी - मुझे पेशाब जाना था, पर मैं बैठ नहीं पा रही थी। जैसे ही बैठने की कोशिश करती, दर्द की लहर उठती और मैं वहीं काँपती खडी रहती दीवार का सहारा लेकर। मुझे डर था, मैं वहीं गिर न जाऊं , उस गंदे बाथरूम में और यहीं कुछ न हो जाए। जैसे-तैसे कपडे बदल कर मैं बाहर आई हाँफती काँपती ननद ने मुझे पकड क़र बिस्तर पर लिटा दिया। दर्द ने अब मेरी कमर पकड ली थी और टाँगे ।

मुझे सख्त प्यास लगी थी। मैं ने पानी माँगा तो पानी देने से इनकार कर दिया गया। सिर्फ होंठ गीले किये गए, प्यास और जोर मारने लगी। ननद बाहर जाकर भाई से गर्म चाय और दूध लाने को कह आई। नर्स ने एक बार आकर मुझे देखा और ननद से कहा -

''अभी देर है। फिर मेरे दर्द से पीले पडे चेहरे की तरफ देख कर पूछा
पहला है।

मैं ने सहमति से सर हिलाया।

'' तेरा आदमी कहाँ है? उसने यों ही पूछा।
'' वो यँहा नहीं रहता, बाहर रहता है।'' मेरी बजाय ननद ने कहा। उसके चेहरे पर विद्रूप भरी मुस्कान दौड ग़यी। फिर मेरा गाऊन उठा दिया - उस वक्त शर्म का नामोनिशान नहीं था। सिर्फ दर्द था - दर्द का समंदर कोई-कोई लहर आकर इतना दूर फेंक देती कि आंखो के आगे अंधेरा छा जाता, जो आस-पास से उठती चीखों से टूटता -
'' अरी दाई री, मैं मर जाऊंगी। मुझे बचा ले।'' एक भयंकर आर्तनाद।
'' ए चुप सिस्टर ने उसे घुडक़ा ''
'' जब ऐसे काम करती है तब भी चिल्लाती है क्या? '' और सारी नर्सेज हंस पडी।
'' अब कभी नहीं करूँगी ऐसा काम, मैं कान पकडती हूँ।'' उसने टूटती हिचकियों में कहा तो फिर हँसी का फव्वारा उठा।

उनकी आँखों में क्रूरता थी, हिकारत, उपेक्षा, व्यंग्य और न जाने क्या-क्या? रूदन की भारी चट्टान मेरी छाती पर पडी हुई है, उसके ऊपर डर की चट्टान, उसके ऊपर शर्म की, उसके ऊपर गुस्से की, उसके ऊपरपता नहीं सिस्टर ने मेरे पेट का साईज देखा, फिर ननद से कहा

'' पहले बच्चे के हिसाब से पेट बडा है। तुम सिंधी लोग खूब घी खाते हो, और ड्रायफ्रूट के बने लड्डू बच्चा मोटा हो जाएगा तो निकलेगा कैसे? क्यों खाते हो ? '' आखिरी वाक्य उसने मुझे देख कर कहा। मैं ने कोई जवाब नहीं दिया।मैं ने अपने सूखे होंठों पर ज़बान फेरी।
'' इसको गर्म चाय पिलाओ।'' उसने ननद से कहा और जाने लगी तो मैं ने उसका हाथ पकड लिया - ''मुझे पेशाब आ रहा है।''
'' तो जाओ करके आओ उसने निहायत बेरूखी से अपना हाथ छुडा लिया।''
मैं बैठ नहीं पा रही हूँ। दो आँसू मेरी आँखों से टपके और आवाज काँप कर टूट गई। इसने मेरा चेहरा देखा और दाई को बुलाकर कहा, इसे पॉट दे दो।

इस बीच कुछ डॉक्टर्स आईं और सरसरी नजर से देखकर चली गयीं। कुछ इंजेक्शन्स भी लगाए गए।

मैं थक कर चूर हो गई हूँ। दर्द ने इतनी पटखनियां दी हैं कि मेरे सारे कस-बल ढीले हो गए हैं। इस बीच तीन बच्चे हो भी चुके। एक को मैंने अपनी जिज्ञासु और आँसू भरी आँखों से देखा - अँधेरे का द्वार खुला पहले बच्चे का सिर फिर उसका बदन बाहर आया खून और सफेद द्रव में लथपथ, नाभि से जुडी नाल बच्चे के बाहर आते ही स्त्री की चीखें शांत वो निढाल हो कर पड रहीबच्चे का शरीर नीला है उसे उल्टा लटका हलकी-हलकी थपकियां लगाई जा रही हैं कि बच्चे के रूदन से समूचा हॉल भर गया है। थोडी देर के लिये दूसरी आवाजें शान्त हो गईं -

''बधाई हो, लडक़ा है। कहाँ है इसकी दादी? तीन लडक़ियों के बाद चलो जल्दी मिठाई खिलाने का प्रबंध करो।''

बच्चे की दादी को सबने घेर लिया। डॉक्टर अपना काम करके बाहर चली गई। दादी खुशी से फूली नहीं समा रही । कमर में खुंसे रूपये निकाले और बाँटने लगी।

'' ए अम्मा, तेरी बहू तो गोरी है, पोता काला।'' किसी दाई ने चुहल की।
'' काला है तो क्या हुआ? है तो लडक़ा।'' खुशी दादी की आँखों से छलकी पड रही है। माँ सुख और संतोष से लेटी मुस्कुरा रही है।

फिर उसे धो पौंछ कर, उसे टाँके लगाकर हल्के-फुल्के कपडे पहना कर वार्ड में शिफ्ट करने को ले जाया गया। और हॉल में फिर वही चीखपुकार।

वहाँ की बातों से मालूम हुआ कि चार दिन पहले की बात है एक औरत के दिन पूरे हो चुके थे। वह डॉक्टर को दिखाने आई तो डॉक्टर ने कहा अभी देर है, घर जाओ, दो दिन बाद आना। दूसरे दिन उसे दर्द उठा और डॉक्टर ने चैकअप करके बताया कि बच्चा पेट में ही मर गया है। अब? अब बच्चा नीचे से ही निकाला जाएगा। दर्द के इंजेक्शन दे कर लिटा दिया। दर्द आधे-अधूरे हो रहे थे कि मृत बच्चे का सिर तो बाहर आ गया, पर धड बाहर नहीं आ पा रहा था। उसे तुरंत ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया बच्चा आधा अंदर आधा बाहरमृत बच्चे का सर काट आधा अंदर से निकाला आधा बाहर से होश में आने पर माँ रो-रो कर पागल हो गई। डर सिर्फ डर जो यँहा आने के बाद मेरी पसलियों में रेंग रहा है - कौन है –मेरा कोई नहीं - कोई नहीं -

एक पेशेन्ट स्त्री की सास मेरी ननद को बता रही थीवह यँहा तीन दिन से है। उसकी बहू को रुक-रुक कर दर्द हो रहे हैं। कल एक डिलीवरी के वक्त बच्चा जब बाहर नहीं आ पा रहा था तो उसे चिमटे से पकड क़र खींचा गया तो बच्चे के सर पर गहरे घाव हो गए। यँहा के लोग बडे ग़ैरजिम्मेदार हैं। एक डायबिटिक स्त्री को, जिसे विवाह के पंद्रह साल बाद पहला बच्चा होने वाला था, ग्लूकोज चढा दिया गया, बच्चा पेट में ही मर गया और स्त्री की हालत अब भी गंभीर है।

मैं कहना चाहती हूँ - '' बस करो, मुझे नहीं सुनना, पर कह नहीं पा रही... जिद, गुस्सा, तडप दर्द, विवशता का जानलेवा अहसास फिर चारों तरफ सिर्फ चीखें और रूदन.....जी चाहता है, मैं भी जोर-जोर से चिल्लाऊं रोऊं, पर हो नहीं पाता।''

दोपहर हो गई है...मैं मछली सी तडप रही हूँ, थकान, नींद और दर्द....दर्द की लहर उठती मैं होंठ दबा कर चीख पडती दबी आवाज में, दर्द की लहर ठहरती मुझे नींद दबोच लेती

मुझे बुखार हो आया। एक डॉक्टर ने देखा और ननद से कहा इसके शरीर पर बर्फ रगडो।

बर्फ मंगवाई गई भाई से और ननद सारे शरीर पर बर्फ रगडने लगीं।

'' शायद ऑपरेशन करना पडे, बच्चेदानी का मुँह छोटा है।'' किसी डॉक्टर ने कहा।
तैयारी करो।
'' दस्तखत कौन करेगा?''
'' मैं कर दूँगी मैं?'' मैं ने तडप कर कहा, पर जो कुछ करना है, जल्दी कीजिये। किसी ने मेरी तरफ ध्यान ही नहीं दिया।

'' आप कर सकती हैं न? आप कौन हैं इनकी? '' किसी ने ननद से पूछा।
उन्होंने कहा, ''मैं कर सकती हूँ, पर आप पहले यही कोशिश करें कि डिलीवरी नॉर्मल हो, घर में कोई बडा नहीं है इसके। मैं मेहमान हूँ।''
'' कैसे-कैसे लोग हैं?'' छोडक़र चले जाते हैं। एक नर्स ने मुँह बिदका कर कहा।

एक अन्य नर्स रेजर लेकर आयी और पेट तथा अन्य अंगों के बाल साफ कर दिये। मेरे सिर पर सफेद कपडा बाँध दिया गया। गाउन उतरवा कर उन्होंने एक सफेद चोगा-सा पहना दिया। मैं समझ गई ऑपरेशन। ननद ने दस्तखत कर दिये।

शायद दो बज रहे हैं।

'' दर्द ले जितना अच्छा दर्द लेगी, उतना जल्दी बच्चा होगा।'' नर्सेज बार-बार आकर मुझे झिडक़तीं।
'' कैसे दर्द लूं? मुझे समझ ही नहीं आता। वे समझातीं, मैं कर तो देती, फिर भी लगता, शायद ठीक से नहीं कर पा रही हूँ।''

मैं ने हथियार डाल दिये कि मैं कुछ और नहीं कर सकती। अब मारो, काटो, जो मन आए करो, मैं तुम्हारे हवाले -
स्ट्रेचर ले आया गया, मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाने के लिये। एक सीनीयर डॉक्टर ने हॉल में प्रवेश किया। नर्सेस सतर्क हो गईं।चीखें-चिल्लाहटें कम। सबको बारी-बारी से देखती वे मेरे पास आईं दुबली-पतली, साँवली सी काया कद लगभग पाँच फीट दो इंच चेहरा निस्पृह, उसने एक पल को मुझे देखा, फिर स्ट्रेचर को-

'' पहला है? '' उन्होंने मुझे पूछा। मैं ने हाँ में सर हिलाया। उसने नर्सेज क़ो इशारा किया। कई एक साथ दौडी और काफी सारा सामान ले आईं। तब तक वे मेरा चैकअप करती रहीं, ननद को जरा दूर खडे रहने को कह दिया।
नर्सेज ने फटाफट उन्हें वे सारी चीजें पहनानी शुरू कर दीं, जो ऐसे समय पर डॉक्टर्स पहनते हैं। पूरी तैयारी के साथ वे मेरे पास आईं-

'' चलिये दर्द लीजिये, बहुत देर हो गई है। बच्चे को खतरा हो सकता है।''
'' खतरा बच्चे को?'' मैं अपना आप भूल गई और जैसा नर्सेज क़हती गईं मैं करती गई '' अपनी टाँगे कस कर पकडिये, शाबाश-शाबाश और थोडा।'' डॉक्टर ने हौसला बढाया। नर्स ने मेरी टाँगे जितना खोल सकती थी खोल दिया।

'' जल्दी हाँ-हाँ जरा जल्दी नहीं तो बच्चा पानी पी जाएगा।'' डॉक्टर की बेताब आवाज।

असहनीय दर्द पर वहाँ मृत्यु का भय नहीं था, न कुछ और मेरे जेहन में सिर्फ बच्चा था, मेरा अपना बच्चा।

'' रूकिये मत रूकिये मत - सिर्फ पाँच मिनट और फिर सब ठीक हो जाएगा। हाँ-हाँ जरा सा और।''

दर्द-दर्द सिर्फ दर्द कोई चीज बाहर आना चाहती है, पर दर्द की चट्टान है, मैं पुरजोर कोशिश करती हूँ हटाने की कि आने वाले को जगह मिल सके पसीने-पसीने, मैं दाँत भींचती मेरे मुँह से अजीब कराहें निकल रही हैं- मैं उन्हें सुनती, मैंने पहले ही चबाए होंठ फिर दाँतों के नीचे भींचे और पूरी ताकत से उस चट्टान को धकेला। चट्टान जरा-सी खिसकी शायद।

'' शाबास बच्चे का सर दिख रहा है जरा सा और जरा सी हिम्मत और नाना हारना नहीं बिलकुल नहीं।''

फिर वही बार-बार वही मुझे पता नहीं मेरी टाँगे हैं भी या नहीं, मेरा जिस्म है या नहीं, कुछ और मुझमें है या नहीं, चेतना एक ही जगह बार-बार टकरा रही है।

'' ओह, गॉड! पहली बार मैं जोर से चिल्ला पडी। फ़िसलती-सी कोई चीज बाहर निकली - जिसे हाथों में ले लिया गया।''

मेरी निगाहें खुद-ब-खुद सामने दीवार पर टँगी घडी क़ी ओर गई। सवा चार। मेरी आँखे मुंद गईं। वे बच्चे को उल्टा कर रुलाने की कोशिश कर रहे हैं, और बच्चा रोया, पहली बार मैंने वह आवाज सुनी। मेरी आत्मा गहरी शांति से भर गई। मैंने आँखे खोलकर बच्चे को देखा-मेरी नाल से लिपटा मेरा बच्चा। उन्होंने उसे मेरे पेट पर लिटा दिया- खून और सफेद द्रव से लिपटी वह नन्हीं गर्म देह मैंने उसे अपने हाथों से छुआ अपने होने को उतना साबित और पूरा उस क्षण में पहली बार जाना।

वे शायद प्लेसेंटा निकाल रहे हैं, जिसमें ज्यादा देर नहीं लगी और नाल काट कर वे बच्चे को नहलाने ले गए। दो दाईयाँ आकर मेरी सफाई करने लगीं

'' बाप रे कितना स्वस्थ बच्चा है। बेबी है, पहला है न?''
मैं मुस्कुरा दी समूची सृष्टि के प्रति कृतज्ञ-
'' बिलकुल तुम्हारे जैसा गोरा-चिट्टा, गोल-मटोल जैसी माँ वैसा बेटी।''
एक नर्स मेरे नजदीक आई तो मैं ने उसका हाथ पकड लिया।
'' थैंक्स टू ऑल ऑफ यू। मेरा गला रुंध गया।''

उसने मुस्कुरा कर मेरा गाल थपथपाया और पहली बार स्नेह से मेरा माथा सहलाया। उस स्पर्श ने मुझे याद दिलाया, मैं कब से कडी धूप में चल रही हूँ और अब मुझे जरा सी छाँव चाहिये - बस जरा सी। मैंने अपनी भर आई आँखों को पीछे लौटा लिया।

साफ करने के बाद उन्होंने मेरी दोनों टाँगे , मेरे पलंग के दोनों ओर लगी दो रॉड्स, जिनमें चमडे क़े दो पट्टे लगे हुए थे, पैर बाँधने को, उस पर उठा कर बाँध दीं। मैं ने चौंक कर पूछा, क्यों?

'' टाँके लगेंगे।'' सिस्टर ने धीरे से कहा। वही डॉक्टर जो चली गई थी, इस बीच आई और बिना मेरी ओर देखे टाँके लगाने लगी। दर्द एक बार फिर शुरू हुआ-सुईयां चुभोता, पर उसके मुकाबले काफी कम जो मुझ पर से गुजर चुका था।

उन्होंने टाँके लगा दिये और इसके पहले मैं कुछ कहती-कहती, वे मेरी बँधी टाँगों को वहीं छोड क़र बाहर चली गई। सिस्टर ने आकर मेरी ड्रेसिंग की और टाँगे खोल कर बिस्तर पर सीधा लिटाया और एक सफेद चादर मुझ पर डाल दी। ओह टाँगे पता नहीं कितनी देर हवा में झूलती रहीं थीं।

ननद मेरे पास आ गई थी और मेरे कपडे , बाल वगैरह ठीक करने लगी थी कि एक दाई ने आकर कहा, बच्ची के कपडे दो और ईनाम । तब बच्ची मिलेगी। वह हँस रही थी।

मैं ने मुस्कुरा कर ननद को इशारा किया। वे बास्केट में से मेरा पर्स निकाल कर ले आई और खोलने लगी थीं कि मैं ने हाथ बढा कर पर्स उनके हाथ से ले लिया और दाई को दे दिया।

वह चहक उठी। उसने आवाज देकर सबको इकठ्ठा कर लिया और वे आपस में बाँटने लगीं।

गुलाबी कपडों में लिपटी मेरी बच्ची को वे पहली बार मेरे पास लेकर आईं और मेरी बगल में लिटा दिया। मैंने पहली बार बच्ची को ठीक से देखा-गोरी, गुलाबी-गुडिया सी मुठ्ठियां भींचे वह सो रही है। नर्म-मुलायम होंठ, एकदम स्वस्थ सुन्दर, माथे पर काफी कम बाल।

'' किस पर गई है? तुम पर या अपने पापा पर? ननद ने हँसते हुए मुझसे पूछा।
किसी पर गई हो , इससे क्या? मुझे यकीन ही नहीं आ रहा था कि मेरे अँधेरों से एक ऐसी भी नदी निकल सकती है, जिसके तटों पर फिर पूरे के पूरे साम्राज्य बसाए जाएंगे। कोई नहीं जानता कि अन्दर के पानियों में जो सपना कांपता है , कब असलियत का रूप लेगा, जब लेता है तो...

पहली बार उसके गर्म माथे को मैं ने अपने होंठों से छुआ और उसे अपनी बाँह में समेट आँखे बंद कर लीं। वह स्पर्श कि अंदर एक के ऊपर एक धरी चट्टानें टूट-टूट कर गिरने लगीं, यकायक जैसे किसी ने रुके हुए बाँध का पानी छोड दिया हो - मेरे गले से तेज हिचकी निकली और पूरे हॉल में फैल गई। लगभग सन्नाटा छा गया। मेरी ननद ने घबरा कर मेरे सिर पर हाथ रखा।

कुछ नर्सेज दौड क़र मेरे पास आ गईं।

मैं जिसे आज तक अपना अकेलापन समझती आई थी - एक अंधी गहरी काली खोह - उसी में से एक सुख अनायास मेरे हाथों में आ गया था। एक अकेलापन, दूसरे अकेलेपन को जन्म दे सकता है, इतना जानती थी, पर यह तो सुख का झरना है, जो जाने कहाँ से फूटता चला आ रहा है। मैं ने अंदर चट्टानों के टूटने की आवाज भी सुनी और फिर शांत-गहरी बहती नदी की भी।
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